गंगा ढाबे का शांत सा माहौल मुझे नॉस्टैल्जिक बना देता है। लैम्प पोस्ट की पीली मद्धिम रोशनी जब बिखरे पड़े बेजान पत्थरों से टकराकर धुंध में बिखरती है तो ऐसा लगता है मानों पत्थर भी बोलने लगे हों। ढाबे पर बिखरे पड़े ये बेडौल बेजान पत्थर छात्रों के बैठने के काम आते हैं। इन बेजान पत्थरों ने इस कैम्पस में न जाने कितने ही राजनैतिक सिद्धांतों को जन्मते और मरते देखा है।
हाथ में पचास पैसे की चाय वाली प्याली लिए, जींस की पैंट और लम्बे कुर्ते में सिगरेट के धुएं उड़ाती लड़के लड़कियों की टोली, न जाने किन सिद्धांतों को लेकर आपस में इतनी मशगूल होती थी कि कब रात के दो बज गए और कब सुबह हो गई, पता ही नहीं चला। उन दिनों सिद्धांत भी तो बहुतेरे होते थे। अब तो दक्षिणपंथी भी धीरे धीरे काबिज़ा होने लगे हैं, नहीं तो एक समय था जब जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) कैम्पस में दक्षिणपंथी कहने भर को हुआ करते थे। वामपंथ के ही इतने फिराके होते थे और वामपंथियों में ही इतनी आपसी खींचतान रहती थी कि किसी दूसरी विचारधारा के लिए अवकाश ही कहां होता था।
ऐसे में, अपने को `अ-पॉलिटिकल' समझने वाले कुछ लोगों ने इन पंथ के झगड़ों से अपने को अलग कर लिया था। वे अपने को `फ्री थिंकर्स' कहने लगे थे। लेकिन धीरे धीरे ये `फ्री थिंकर्स' भी एक अलग समूह बन गए और एक नई विचारधारा बनकर अस्तित्व में आ गई। कुछ ही समय में, इन लोगों ने कैम्पस में एक मज़बूत संगठन खड़ा कर लिया और अपनी एक स्वतंत्र राजनैतिक पहचान भी बना ली। किसी विचारधारा से नहीं जुड़ना भी शायद एक विचारधारा ही होती है।
इन पत्थरों पर बैठे छात्र-छात्राओं का गोल हो या कि प्रेमालाप में लिप्त जोड़े, दुनिया भर की राजनैतिक गतिविधियों और उनकी पेचीदगियों को बड़ी ही बौद्धिकता और संजीदगी से समेटकर क्षण में इस ढाबे पर ले आते थे। यहां रोमांस के मानदंड भी मार्क्सवाद और उसके सहयोगी वादों से ही निर्धारित होते थे। प्रेमालाप के विषय भी प्राय: राजनैतिक ही हुआ करते थे। ऐसी कुछ विशेषताएं ही तो थीं जो अन्य विश्वविद्यालयों की भेड़चाल से जेएनयू को अलग करती थीं।
यहां दक्षिणपंथी विचारधारा के लोगों को रोमांस के अवसर कम ही प्राप्त हो पाते थे और शायद इसीलिए वे गुस्साए रहते थे। ईर्ष्या और क्रोध का यह ग्राफ महाजन के ब्याज की तरह बढ़ता रहता था और इस तरह उनकी जो छवि उभरकर सामने आती थी उसे वामपंथी बिल्कुल पसंद नहीं करते थे और उन्हें `लुम्पेन' कहकर उनकी भर्त्सना किया करते थे।
उन्हीं दिनों इस कैम्पस में वामपंथियों के एक नए फिरके का जन्म हुआ जो अपने तेवर में पिछली सभी वामपंथी विचारधाराओं में सबसे अधिक आक्रामक और जुझारू था। इसका नाम था `आइसा'। अपने को एक मिशन बनाकर चलने वाली किसी भी आक्रामक और जुझारू विचारधारा की सफलता में संदेह की गुंजाइश कम ही होती है। शायद यही कारण था कि `आइसा' में सफलता के कई सोपान चढ़े।
उन दिनों जेएनयू की छात्र राजनीति का चरित्र देश की मौजूदा राजनैतिक चरित्र से भिन्न था। यहां छात्र-संघ के चुनाव किसी जातीय या धार्मिक आधार पर नहीं लड़े जाते थे बल्कि यहां चुनाव एक सिद्धांत की लड़ाई होते थे। कुछ और भी समीकरण होते थे जो चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। चुनाव की दृष्टि से एक लड़के को एक वोट माना जाता था जबकि एक लड़की को कम से कम चार वोट समझा जाता था। किसी लड़की के पास उसके अपने वोट के अलावा उसके `ब्वॉय फ्रेंड' का एक वोट और कम से कम दो वोट रक़ीबों के होते थे। कभी कभी `ब्वॉय फ्रेंड' का वोट सैद्धांतिक विरोधों के कारण अनिश्र्चित भी हो जाया करता था लेकिन रक़ीबों के वोट-बैंक में सेंध नहीं लग पाती थी। `आइसा', `एसएफआई', `एआईएफएस' जैसे छात्र संगठनों में लड़कियों को अपने अपने दलों के कैडर बनाने की आपसी होड़ लगी रहती थी। `एनएसयूआई', `फ्री थिंकर्स' और `डीआरएसओ' जैसे संगठन इस होड़ में हर बार पिछड़ जाते थे। इसका सीधा असर चुनाव के नतीजों पर पड़ता था। `एनएसयूआई' और `डीआरएसओ' अपनी लाख कोशिशों के बावजूद फ्रेशर्स को अपने संगठन से जोड़ पाने में असफल हो जाते थे। इनसे जुड़ने वाली लड़कियां प्राय: पीएच.डी की होती थीं या फिर `नाइन-बी-एक्सटेंशन' पर चल रही होती थीं। ज़ाहिर है कि उनका `मार्केट वैल्यू' ऐसा नहीं होता था कि उनसे चार वोट या उससे अधिक की उम्मीद की जा सके। उन्हें एक वोट ही माना जाता था। उनके लिए कोई मारा मारी भी नहीं थी। एक वोट वाली इन्हीं लड़कियों ने कैम्पस के लोगों को इस रहस्य से अवगत कराया था कि जेएनयू में भी लड़कियों के साथ छेड़ छाड़ की वारदात होती है। नहीं तो, यहां के घुटन मुक्त माहौल में किसे अंदाज़ा हो सकता था कि छोटे मोटे कस्बों की तरह यहां भी लड़कियों को छेड़ने की वारदात होती होगी!
जेएनयू कैम्पस में `एबीवीपी' की सदस्यता को सार्वजनिक स्वीकृति प्राप्त नहीं थी इसलिए इसकी सदस्यता लेना `आ बैल मुझे मार' वाली बात हुआ करती थी।
ढाबे पर चर्चा बहुत गर्म हुआ करती थी लेकिन कोलाहल कहीं नहीं होता था। कभी कभी कोई खिलखिलाती हंसी गूंज जाया करती थी। लेकिन यह पता नहीं चल पाता था कि यह हंसी कहां से और किस बात पर आई थी। पास में एयरपोर्ट था इसलिए प्रत्येक दस-पांच मिनट में गुज़रने वाला हवाई जहाज शोर के सैलाब को लेकर आता, लेकिन फिर सेकेण्डों में सब कुछ शांत हो जाया करता था। ऐसे में, इस पूरे वातावरण को दूर से आती किसी के ज़ोर ज़ोर से गाने की आवाज़ चीरती रहती थी।
विद्रोहीजी क्या गाते थे, मालूम नहीं। लेकिन चूंकि आवाज़ दिल से निकलती थी इसीलिए कर्कश नहीं लगती थी। धुन भी उनकी होती थी और बोल भी उनके। मैंने उनसे एक दिन पूछाज्ञ् विद्रोहीजी आप ये क्या गाते रहते हैं? कुछ समझ में नहीं आता है।
उनके अपने तर्क होते थे। उन्होंने कहाज्ञ् कल झेलम लॉन वाले कार्यक्रम में वह चिंकी महिला जो चीख रही थी, क्या आपकी समझ में आ रहा था?
मैंने `ना' में सिर हिला दिया।
ज्ञ् जब आप उसे तल्लीनता से सुन सकते हैं तो फिर मुझे क्यों नहीं?ज्ञ् उनका सीधा सा सवाल था। मैं मुंह ताकता रह गया। उनकी बात भी ठीक थी। इस तरह के कार्यक्रमों में ऐसे लोग भी खासी दिलचस्पी लेकर तल्लीन हो जाया करते थे जिनका संगीत से कोई लेना देना नहीं होता था। ऐसा महज़ इस डर से होता था कि कोई ये न कहे कि आप इन्टेलैक्चुअल नहीं हैं।
ज्ञ् साथी, यदि मेरा गाना आपकी समझ में नहीं आ रहा है तो इसमें मैं क्या कर सकता हूं? आप अपने को परिमार्जित कीजिए।ज्ञ् विद्रोहीजी मुझसे कह रहे थे। ज्ञ् रासो तो आपने पढ़ा ही होगा? कई ऐसे रासो काव्य हैं जिन्हें सामने रख दिया जाए तो हिन्दी जानने का दावा करने वाले अच्छे अच्छों को अपनी औक़ात समझ में आ जाए।
विद्रोहीजी की बातों का तात्पर्य मेरी समझ में इतना ही आ रहा था कि वे जो कुछ भी गा रहे हैं वह अर्थहीन या किसी सनकी का आलाप नहीं है, बल्कि कुछ गंभीर बातें हैं जिन्हें सुनी जाना चाहिए। पूरा गंगा ढाबा विद्रोहीजी का श्रोता हुआ करता था, लेकिन उन्हें सुनता शायद ही कोई था।
मैंने पूछाज्ञ् विद्रोहीजी, जब कोई सुन नहीं रहा है तो आप इस तरह ज़ोर ज़ोर से क्यों गा रहे हैं?
विद्रोही को जवाब सोचना नहीं पड़ता था। हमेशा हाज़िर जवाब। लेकिन नपे-तुले शब्दों में, मानों किसी मंच पर बोल रहे हों। बोलेज्ञ् देखिए साथी, नहीं सुनते हुए भी आज आपने मुझसे यह सब तो पूछ ही लिया न! एक दिन आएगा जब समय आप सबसे पूछेगा कि विद्रोही से क्यों नहीं पूछा।
मुझे उनकी बातें अटपटी सी लग रही थीं। फिर भी मैंने चर्चा जारी रखीज्ञ् विद्रोहीजी, आपने संगीत तो सीखा नहीं है लेकिन गाते आप सुर में हैं। ज्ञिवद्रोहीजी के नाराज़ होने की आशंका से मैंने दबी जुबान में पूछा।
विद्रोहीजी ने दार्शनिकों की तरह जवाब दियाज्ञ् साथी, सीखकर कोई कलाकार नहीं बनता। कला अन्दर की चीज़ होती है जो कविता-कहानी, गीत-संगीत और विद्रोही की अटपटी बातों में ही अभिव्यक्त होती है।ज्ञ् विद्रोही आसमान की ओर देख रहे थे और मैं विद्रोही की ओर। विद्रोही की बातें मेरी समझ से परे होती थीं। फिर भी, मैं धैर्य से सुनता था।
मैंने पूछाज्ञ् विद्रोहीजी, अभी अभी जो आप गा रहे थे उसका क्या अर्थ है?
विद्रोही हंसे पर कुछ बोले नहीं। थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझसे पूछाज्ञ् अच्छा साथी, ये बताइए कि यदि मैं आपको अभी दो-तीन पृष्ठों का कोई गद्य पढ़कर सुनाने लगूं तो क्या आप सुनेंगे?ज्ञ् फिर थोड़ा थमकर, मुस्कुराते हुए बोलेज्ञ् मैं ढाबे पर खड़े होकर ज़ोर ज़ोर से बोलने लगूं और कहूं कि भाइयो, मुझे सुनो तो आज की ही रात पागल घोषित कर दिया जाऊंगा। लेकिन गीत-संगीत में यही सुविधा होती है कि आप इसके माध्यम से कहीं भी, कुछ भी कह सकते हैं। गद्य सुनने की नहीं, पढ़ने की चीज़ होता है। श्रव्य तो गीत-संगीत और काव्य ही हो सकते हैं।
मुझे विद्रोही की बातों में सनक से अधिक बौद्धिकता दिख रही थी। शायद बौद्धिकता को ही सनक कहते हैं। मैंने किसी से सुन रखा था कि स्वस्थ और अस्वस्थ मानसिक स्थितियों के बीच की विभाजक रेखा बहुत क्षीण होती है। आज यह महसूस कर रहा था। मैंने एक सिगरेट सुलगाई।
ज्ञ् साथी, एक सिगरेट मुझे भी पिलाइए।ज्ञ् विद्रोहीजी ने आदेश दिया। मैंने उन्हें एक सिगरेट दिया और पूछाज्ञ् चाय पिएंगे आप?
ज्ञ् क्यों नहीं, आप पिलाएंगे तो ज़रूर पीऊंगा।
थोड़ी देर चुप रहने के बाद सिगरेट का एक लम्बा कश लेते हुए विद्रोहीजी ने कहाज्ञ् साथी, मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन किससे कहूं? कौन सुनेगा? किसे फुर्सत है? क्या यह क्राउड सुनेगी जिसे अपने कॅरियर, गर्ल फ्रेंड और ब्वॉय फ्रेंड के अलावा कुछ और दिखता ही नहीं? कौन सुनेगा? मैं ढाबे पर खड़े होकर बांग तो नहीं दे सकता न! इसीलिए गाता हूं। कोई यह तो नहीं कहेगा कि अरे पगले... क्या सनकियों की तरह बोल रहा है। इसीलिए मैं गाकर अपनी बात कहता हूं।ज्ञ् विद्रोहीजी बोलते हुए भावुक हो गए थे। थोड़ी देर चुप रहने के बाद उत्तेजित होते हुए बोल पड़ेज्ञ् टेलीविजन पर पता नहीं कितने ही महाराज, कितने बापू, ये अलां वो फलां घंटों बकवास करते रहते हैं तो लोग सुनते हैं कि नहीं? मैं गाना ही तो गाता हूं, इन तथाकथित साधु-महात्माआें की तरह भोली भाली जनता का मानसिक शोषण करके पैसे तो नहीं बना रहा हूं? मैं गा रहा हूं, जिसे सुनना है सुने, नहीं तो मेरी बला से। विद्रोहीजी आपे में नहीं थे। मैंने अब वहां से खिसक निकलने में ही अपनी भलाई समझी थी।
श्यामकांत सिंह `विद्रोही' आज़मगढ़ के रहने वाले थे। आज़मगढ़ पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा है। यहां बड़ी बड़ी विभूतियों ने जन्म लिया है और यहां की मिट्टी को कृतार्थ किया है। आज़मगढ़ की युवा शक्ति इन विभूतियों का नाम बड़े गर्व से लेती है। इन्हीं विभूतियों में एक श्रेष्ठ नाम है अबू सलेम का, जो यहां के बेरोज़गार नवयुवकों के आदर्श हुआ करते हैं और जिन्होंने आज़मगढ़ का नाम पूरी दुनिया में रोशन किया है। एक ज़माना था जब आम लोग गुंडे-बदमाशों से अपनी रिश्तेदारी छुपाते थे, लेकिन अब तो समाज के मानदण्ड ही बदल गए हैं। कहते हैं कि उमराव जान अदा भी यहीं कहीं आसपास के किसी कस्बे की रहने वाली थीं लेकिन अब लोगबाग उन्हें भुला बैठे हैं।
इसी आज़मगढ़ से बी.ए. पास करने के बाद विद्रोही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय आ गए। सारे इलाक़े में शोर था कि विद्रोही की तो ज़िन्दगी ही बन गई। अब तो बड़ा अफसर बनकर ही लौटेगा। लेकिन जेएनयू आने के बाद विद्रोही अपने नाम को वास्तविक अर्थवत्ता देने में जुट गए। विद्रोही प्रवृत्ति तो थी ही, ग़रीब किसान का बेटा दिल्ली की आर्थिक विषमता को देखकर आंदोलित हो उठा। जेएनयू के प्रखर राजनैतिक माहौल ने आंदोलित मन को आश्रय भी दिया। जेएनयू की पूरी छात्र राजनीति बांहें पसारकर उद्वेलित मन की तलाश में ही तो रहती थी। विद्रोही को भी एसएफआई का हार्डकोर काडर बनते देर न लगी।
विद्रोही जेएनयू में हिन्दी विभाग के एक मेधावी छात्र थे। एम.ए., एम.फिल, फिर पीएच.डी, लेकिन पीएच.डी अधूरी रह गई। जीवन में एक विद्रोहिनी आ गइंर्। दोनों एक ही सेंटर में थे, इसलिए बात आगे बढ़ गई। धीरे धीरे ऐसा लगने लगा मानो तूलिकाजी ही विद्रोही के शोध का विषय बन गई हों। सुबह-शाम-दोपहर सब तूलिकाजी के नाम। तूलिकाजी सुंदर तो थीं ही, अपनी सुंदरता का मतलब भी समझती थीं। तूलिकाजी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा भी रखती थीं इसीलिए पढ़ाई लिखाई के लिए समय नहीं बच पाता था। लेकिन विद्रोहीजी आख़िर किस मर्ज की दवा थे? तूलिकाजी को परेशानी में तो नहीं देख सकते थे? फिर क्या था, उन्होंने तूलिकाजी का एम.फिल. डिजर्टेशन लिख डाला। विभाग में इसे ख़ूब सराहा गया। इसी के बाद से विभाग में तूलिकाजी की मेधा के भी चर्चे होने लगे थे।
उन दिनों `आइसा' की कमांड विनयजी के हाथों में थी। विनयजी की राजनैतिक दूरदर्शिता उन्हें यह मश्वरा दे रही थी कि यदि किसी भी तरह से तूलिका को `आइसा' से जोड़ने में सफल हो जाते हैं तो इस बार यूनियन पर उनका कब्जा पक्का हो जाएगा। विनयजी इस बात को अच्छी तरह समझते थे कि तूलिका के इस दल से जुड़ जाने का अर्थ थाज्ञ् मनचले लड़कों के एक बड़े जत्थे की निष्ठा-प्राप्ति।
आख़िरकार विनयजी अपने उद्देश्य में सफल हुए। माध्यम बने विद्रोही। विनयजी का जादू विद्रोही के सिर चढ़कर ऐसा बोला कि विद्रोही `एसएफआई' को छोड़ `आइसा' के सदस्य बन गए। लेकिन विद्रोही और विनयजी की लम्बे समय तक निभ नहीं पाई। विद्रोही की विद्वता और ओज के साये तले विनयजी का आभा मंडल मलिन पड़ता दिखने लगा। ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया। दूसरी ओर, तूलिकाजी को भी `आइसा' से जुड़ने के बाद अपनी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा के पूरे होने के आसार दिखने लगे थे। विनयजी को भी तूलिका में बहुत सारी संभावनाएं दिख रही थीं। वे तूलिका से राजनैतिक लाभ तो लेना चाहते थे ही, उससे उसके नारी होने के बावजूद राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा की कीमत भी वसूलना चाहते थे। किंतु विद्रोही के रहते उनकी यह योजना पूरी नहीं हो सकती थी, यह बात उनसे छुपी हुई नहीं थी। यही कारण था कि उन्हें अब विद्रोही की उपस्थिति चुभने लगी थी। विनयजी नारी को सम्मोहित करने की कला में, विद्रोही की तुलना में भले ही कमज़ोर थे परन्तु राजनैतिक प्रपंच में वे अव्वल थे। अब तक विनयजी ने विद्रोही के विरुद्ध हाथ-पैर मारना शुरू कर दिया था।
इधर विद्रोही की बेवफाई से आहत `एसएफआई' भी उनसे खार खाए बैठी थी। फिर क्या था। शत्रु का शत्रु मित्र होता है। विनयजी अवसर से लाभ उठाना ख़ूब जानते थे। उन्होंने `एसएफआई' के साथ एक गुप्त संधि कर ली। इस नए मोर्चे ने विद्रोही की चूलें हिला दी।
बावजूद इसके विद्रोही ने हार नहीं मानी। डटे रहे। दल के अंदर उन्हें एक फिरके का समर्थन प्राप्त था। ताक़त वहां से मिल रही थी। लेकिन बकरे की मां कब तक खैर मनाती? वही हुआ जिसका अंदेशा था। नए गठजोड़ ने तुरुप के इक्के की अंतिम चाल चली। विद्रोही साम्प्रदायिक संगठनों के एजेन्ट घोषित कर `आइसा' से बाहर निकाल दिए गए।
जेएनयू में साम्प्रदायिक संगठनों से जुड़ने का सीधा अर्थ होता हैज्ञ् नारी समाज से तिरस्कृत होना। विनयजी ने अन्य छात्र राजनैतिक संगठनों से भी अपना गणित फिट कर लिया था। इस तरह बग़ैर किसी विरोध के विद्रोहीजी कैम्पस में राजनैतिक रूप से अलग थलग कर दिये गए। पीएच.डी का काम भी अभी तान-चौथाई से ज़्यादा बाकी था। सारा समय तो तूलिकाजी के एम.फिल डिजर्टेशन में निकल चुका था। और अब तो तूलिकाजी ने भी किनारा कर लिया था। विनयजी ने विद्रोही के विरुद्ध अपने राजनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल करने में भी कोई कोताही नहीं बरती थी। इसीलिए लाख कोशिशों के बावजूद विद्रोही को एक्सटेंशन नहीं मिल पाया। पीएच.डी अधूरी रह गई और अंतत: विद्रोही जेएनयू से बाहर निकाल दिए गए।
कुछ समय तक विद्रोही कैम्पस से ग़ायब रहे। किसी को पता नहीं था कि कहां गए। लेकिन कुछ महीनों के बाद वे कैम्पस में फिर से नज़र आए। अब यहां उनका कोई शत्रु नहीं था। वेश-भूषा भी बदली हुई थी। एक पुरानी सी जींस, मैला कुचैला सा कुर्ता, पांव में एक पुरानी सी चप्पल, दाढ़ी भी बढ़ी हुई थी।
मैंने पूछाज्ञ् आजकल कहां है विद्रोहीजी? क्या चल रहा है?
विद्रोही आसमान की ओर शून्य में देखकर बड़बड़ाने लगेज्ञ् मैं एक किसान हूं, आसमान में धान रोप रहा हूं। लोग कहते हैं कि अरे पगले, आसमान में कहीं धान उगता है। मैं कहता हूं, अरे घेघले जब धरती पर भगवान उग सकता है तो आसमान में धान क्यों नहीं उग सकता। और अब हम दोनों में से एक ही बात होगी या तो आसमान में धान उगेगा या फिर धरती से भगवान उखड़ेगा।
बड़बड़ाते हुए विद्रोही बेपरवाह कदमों से धुंध में कहीं खो गए थे। दिन ब दिन विद्रोहीजी की सनक बढ़ती जा रही थी। पत्थरों पर आकर बैठ जाना, अपने आप ही बड़बड़ करते रहना और ज़ोर ज़ोर से गाना गाना, यह सब उनकी रोज़मर्रा की गतिविधियों में शामिल हो गया था। मैं जब भी जेएनयू आता तो मेरी आंखें विद्रोही को ढूंढा करती थीं। वे प्राय: ढाबे पर मिल जाते थे। मैं उनसे ज़रूर मिलता और उन्हें एक प्याली चाय और विल्स फिल्टर सिगरेट पिलाता था। मैंने विद्रोही का छात्र जीवन देखा था शायद इसीलिए मैं उनसे सहानुभूति रखता था।
बहुत देर से मैं उन्हीं पत्थरों को घूर रहा था जिन पर बैठकर विद्रोहीजी गाया करते थे। मैं न जाने किन ख़्यालों में गुम था कि अचानक किसी ने मुझे टोकाज्ञ् इन पत्थरों में क्या ढूंढ रहे हो भाई? मैं जैसे नींद से जागा।
मैंने कहा, यहां बैठकर एक आदमी ज़ोर ज़ोर से गाया करता था। आज दिख नहीं रहा है?
ज्ञ् आप शायद विद्रोही पगले की बात कर रहे हैं! ज्ञ्उसने मेरी ओर आश्चर्य से देखा।
हां हां, वही। मैंने हामी भरी।
अरे साहब, उसे मरे खपे तो बरस बीत गए। ज्ञ् उसने निरपेक्ष भाव से कहा।
कब? कैसे? ज्ञ् मेरे मन में अचानक कई सवाल एक साथ उठ खड़े हुए।
अब राम जाने क्या हुआ था। कोई कहता था कि ठंड से अकड़ कर मर गया, तो कोई कहता है कि उसने आत्महत्या कर ली...। किसी को सही सही मालूम नहीं। इन्हीं पत्थरों पर तो लुढ़की पड़ी थी लाश।
मैं भारी मन से कैम्पस से बाहर आ गया था लेकिन विद्रोही के गाने अभी भी मेरे कानों में गूंज रहे थे।
(वागर्थ के नवंबर , 2005 अंक में पूर्व प्रकाशित )
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6 comments:
आपने जेएनयू के राजनीतिक माहौल का सटीक वर्णन किया है।
विद्रोही जी जीवित हैं। मैंने उनकी कविताएँ सुनी हैं। वे कुछ दिन पहले मुझे गंगा ढाबा पर दिखे थे।
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विद्रोही इन दिनो एक दक्षिणपंथी साजिश का शिकार हुए हैं और कैंपस में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई है।
http://vikshobh.blogspot.com/2010/09/blog-post.html
vidrohi ji se mai octobar 2012 me mla hu ,unce unki kavita bhi suna ,unhe googal ij unki kavita bhi dikhai aap chahe to 09822867648 ij sampark kar sakte hai
amarendra aarya
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